ईमानदारी की जिंदा मिसाल है ये गाँव, दुकानों पर ताला नहीं…चोर भी हो जाते हैं ईमानदार!

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क्या आपने कभी सपने में भी ऐसी जगह के बारे में सोचा है जहाँ दुकानों पर ताले की ज़रूरत ही न पड़े? जहाँ दुकानदार चाय पीने चला गया हो और आप अपना सामान खुद लेकर पैसे रख जाएँ? सुनकर लगता है कोई फ़िल्मी गाना है न? पर है बिल्कुल असली! भारत में एक ऐसा ही अनोखा गाँव मौजूद है जहाँ ‘शॉपिंग’ नहीं, ‘ईमानदारी’ का सौदा होता है।

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के ज़माने में जहाँ हम अपनी छोटी से छोटी चीज़ पर भी ताला लगाने से नहीं चूकते, वहीं भारत में एक गाँव ऐसा भी है जहाँ ‘विश्वास’ ही सबसे बड़ा ताला है। यहाँ की दुकानें तालों से नहीं, बल्कि लोगों की ईमानदारी से सुरक्षित रहती हैं।

पढ़ने में यह किसी परीकथा जैसा लगे, लेकिन यह सौ प्रतिशत सच है। हम बात कर रहे हैं नागालैंड के खूबसूरत खोनोमा गाँव की, जो अपनी हरियाली के साथ-साथ अपनी ‘बे-ताला’ ईमानदारी के लिए दुनिया भर में मशहूर है। चलिए, आपको वर्चुअल टूर पर लिए चलते हैं इस ‘ईमानदारी के म्यूज़ियम’ में।

भरोसे की दुकान, ग्राहक है मालिक!
खोनोमा गाँव की पगडंडियों पर चलते हुए आपको सब्ज़ियाँ, फल या स्थानीती हस्तशिल्प की छोटी-छोटी दुकानें दिखेंगी। मगर हैरानी की बात ये है कि इन पर कोई दुकानदार नज़र नहीं आएगा! यहाँ ग्राहक खुद अपनी ज़रूरत का सामान लेता है और उसकी कीमत एक डिब्बे में डाल देता है। यहाँ तक कि अगर उसके पास खुले पैसे नहीं हैं, तो वह बाद में आकर भी रकम चुका सकता है। यह व्यवस्था सदियों से चल रही है और आज भी बिना किसी CCTV के पूरी ईमानदारी से चल रही है।

घरों पर भी नहीं चमकता ताला!
इस गाँव के लोग इतने सीधे-सादे और भरोसेमंद हैं कि वे अपने घरों के दरवाज़ों पर भी ताला नहीं लगाते। उन्हें पूरा विश्वास है कि उनका सामान सुरक्षित है। शायद, यहाँ के चोर भी इतने ईमानदार हैं कि चोरी करने का विचार भी उनके दिमाग में नहीं आता!

‘केन्यो’ परंपरा है राज़ का खज़ाना
यह अनूठी ईमानदारी यहाँ की अंगामी जनजाति की ‘केन्यो’ परंपरा से आती है, जो 154 नियमों पर चलती है। ये नियम लोगों को प्रकृति से प्यार करना, एक-दूसरे का सम्मान करना और बुरे कामों से दूर रहना सिखाते हैं। यही वजह है कि इस गाँव में अनुशासन और नैतिकता की जड़ें बहुत गहरी हैं।

एशिया का पहला ग्रीन विलेज है ये
यह ईमानदारी कोई दिखावा नहीं, बल्कि यहाँ के संस्कारों की देन है। बच्चे बचपन से ही विश्वास और सम्मान का पाठ पढ़ते हैं। यहाँ चोरी करने को सबसे बड़ा पाप माना जाता है। इसके अलावा, यह गाँव एशिया का पहला ‘ग्रीन विलेज’ भी है, जहाँ शिकार और जंगल काटना पूरी तरह से प्रतिबंधित है। यहाँ के लोग मानते हैं कि प्रकृति और इंसान का रिश्ता भी विश्वास पर ही टिका है।

गाँव

हस्तशिल्प का है खजाना
यह गाँव अपनी बाँस और बेंत से बनी खूबसूरत और टिकाऊ हस्तशिल्प कलाकृतियों के लिए भी प्रसिद्ध है। यह हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रहा है।

सच कहें तो खोनोमा गाँव हमें एक जीती-जागती सीख देता है कि विश्वास और ईमानदारी से भरी दुनिया आज भी मौजूद है। यह गाँव सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि एक आदर्श है जो याद दिलाता है कि इंसानियत और आपसी भरोसा ही दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है।

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खोनोमा गाँव के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. खोनोमा गाँव में अगर कोई चोरी कर दे तो क्या होता है?

खोनोमा गाँव में चोरी की घटना लगभग न के बराबर होती है, क्योंकि यहाँ के लोगों की परवरिश और ‘केन्यो’ परंपरा उन्हें बचपन से ही ईमानदारी का पाठ पढ़ाती है। सामुदायिक दबाव और शर्मिंदगी की भावना इतनी strong है कि चोरी का विचार भी किसी के मन में नहीं आता। अगर कोई ऐसा कर भी देता है (जो कि बहुत दुर्लभ है), तो उसके लिए समुदाय के सामने शर्मिंदा होना ही सबसे बड़ी सजा है।

2. क्या कोई tourist वहाँ जाकर इस ‘बिना ताला’ प्रथा का अनुभव कर सकता है?

जी बिल्कुल! Tourist नागरिकों का खोनोमा गाँव में स्वागत है। आप वहाँ जाकर इस अद्भुत व्यवस्था को अपनी आँखों से देख और अनुभव कर सकते हैं। आप दुकान से सामान ले सकते हैं और निर्धारित डिब्बे में पैसे डाल सकते हैं। हाँ, पर्यटकों से यही उम्मीद की जाती है कि वे इस पवित्र विश्वास का सम्मान करें और पूरी ईमानदारी से इस प्रथा का पालन करें।

3. ‘ग्रीन विलेज’ का title पाने के पीछे क्या वजह है?

खोनोमा गाँव को ‘एशिया का पहला ग्रीन विलेज’ इसलिए घोषित किया गया है क्योंकि यहाँ के समुदाय ने मिलकर जंगलों की कटाई और अंधाधुंध शिकार पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। यहाँ के लोग पर्यावरण संरक्षण को अपनी संस्कृति का एक अटूट हिस्सा मानते हैं और टिकाऊ जीवन शैली अपनाते हैं, जो उनकी ‘केन्यो’ परंपरा का ही एक हिस्सा है।